गाँधी वध क्यों ? के कुछ अंश ...

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गांधी के सामान की बिक्री पर मिडिया अभी तक विधवा प्रलाप कर रही है जैसे मिडिया से उसके खबरों के प्रसारण का अधिकार छीन गया हो लेकिन इन देश बेचते कांग्रेसी गांधीवादियों पर मिडिया की जुबान नहीं खुलती| आखिर गांधी का सामान मिडिया के लिए इतना जरुरी क्यों है जबकि एक मनोरोगी था गाँधी जो अहिंसा का नहीं हिंसा का पुजारी था ,, उस हिंसा का पुजारी जो हिन्दुओं पर की जाती थी ,, भले ही मोपला विद्रोह हो या बंगाल दंगे ,, स्वामी श्रधानंद का हत्यारा जिसे गाँधी ने अपना भाई माना , पकिस्तान की मांग करने वाले जिन्ना के साथ गाँधी की रोटी बोटी के बारे में पूरी दुनिया जानती है | पकिस्तान बनने के बाद लाखो हिन्दुओं को मारा गया और गाँधी ने इस हिंसा के जबाब में अपना तुगलकी फरमान सुनाया की भले ही पकिस्तान से हिन्दुओं की लाशें आती रहे लेकिन भारत से एक भी मुसलमान की लाश पकिस्तान नहीं जानी चाहिए और लाखो हिन्दुओं के क़त्ल का इनाम 55 करोड़ रूपया गाँधी ने जिद्द करके पकिस्तान को दिलाया || बात करते है गाँधी के बचपन की ,,, गाँधी का पिता करमचंद गांधी हिंदु मोध समुदाय से संबंध रखता था और अंग्रेजों के अधीन वाले भारत के काठियावाड़ एजेन्सी में एक छोटी सी रियासत पोरबंदर प्रांत के दीवान अर्थात प्रधान मंत्री था परनामी वैष्णव हिंदू समुदाय की उनकी माता पुतलीबाई करमचंद की चौथी पत्नी थी यानी गाँधी के पिता की चार शादी हुयी थी | गाँधी के पिता की तीनो पहले की तीनो पत्निय प्रसब के दौरान मरी बच्चो को भी नहीं बचाया जा सका मगर हम भारतवासियों की बुरी किस्मत थी की गाँधी के पिता का चौथा प्रयास सफल हो गया और संतों की भारत भूमि पर गंधासुर नामक दैत्य की उत्पत्ति हुयी | गाँधी जब १३ साल का था तब उसका विवाह १४ साल की कस्तूरबा माखनजी से कर दिया गया , यह विवाह एक व्यवस्थित बाल विवाह था जो उस समय उस क्षेत्र में प्रचलित था लेकिन उस क्षेत्र में वहां यही रीति थी कि किशोर दुल्हन को अपने मातापिता के घर और अपने पति से अलग अधिक समय तक रहना पड़ता था | अब यंहा गौर करने वाली बात है अधिक समय की जब गांधी १५ वर्ष का था तब पहली संतान ने जन्म लिया ( यानी गाँधी अपनी पत्नी से ज्यादा समय तक अलग नहीं रह पाया ) लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रहीं और इसी साल के प्रारंभ में गांधी के पिता करमचंद गाधी भी चल बसे | मोहनदास गाँधी और कस्तूरबा के चार संतान हुई जो सभी पुत्र थे- हरीलाल मणिलाल , रामदास , और देवदास पोरबंदर के मिडिल स्कूल और राजकोट में उनके हाई स्कूल दोनों में ही शैक्षणिक स्तर पर गांधी जी एक औसत छात्र रहे। उन्होंने अपनी मेट्रिक की परीक्षा ( उस समय आठवी कक्षा ) भावनगर गुजरात के समलदास कॉलेज कुछ परेशानी के साथ उत्तीर्ण की और जब तक वे वहां रहे अप्रसन्न ही रहे क्योंकि उनका परिवार उन्हें बेरिस्टर बनाना चाहता था। गांधी ४ सिंतबर 1888 यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ लंदन में कानून की पढाई करने और बेरिस्टर बनने के लिए इंग्लेंड, लंदन गया अंग्रेजो के आधीन काम करने वाले परिवार का बच्चा उस समय गया जब भारत के लोगो के लिए विदेश में पढाई कर पाना आज जितना आसान नहीं था ,, गाँधी फिर भी विदेश गया वकालत की पढाई करने | पैसा कहाँ से आया विदेश जाकर वकालत की पढाई करने के लिए क्योकि गाँधी के पिता की मौत के बाद परिवार की दशा बहुत ही दयनीय थी | फिर भी गाँधी विदेश गया ,, निश्चित ही यह अंग्रेजो से एक रणनीति के तहत ही गाँधी को काला अंग्रेज बनाने का काम किया गया था || गाँधी के भारत में आने से पहले के किस्से भी बहुत मशूहर हुए ,, कहते है इंग्लैंड और वेल्स बार से वापस बुलावे पर वे भारत लौट आया किंतु मुंबई में वकालत करने में उसे कोई खास सफलता नहीं मिली। बाद में एक हाई स्कूल शिक्षक के रूप में अंशकालिक नौकरी के लिए अस्वीकार कर दिए गया ( योग्यता होती तो पद मिलता ना ) १८९३ में एक भारतीय फर्म से नेटाल दक्षिणी अफ्रीका जो तब अंग्रेजी साम्राज्य का भाग होता था में एक वर्ष का करार स्वीकार लिया था यानी इस बार भी अंग्रेजो की ही गुलामी | दक्षिण अफ्रीका में गांधी को भारतीयों पर भेदभाव का सामना करना पड़ा ऐसा गाँधी ने अपने लिए लिखी किताब में खुद लिखा है आरंभ में उसे प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के लिए में ट्रेन से बाहर फैंक दिया गया था ये बात भी गाँधी ने खुद ही बताई ट्रेन के पायदान पर एक यूरोपियन यात्री के अंदर आने का रास्ता रुकने की वजह के लिए उसे चालक द्वारा पिटाई भी झेलनी पड़ी थी ,,, ( चालक क्या ट्रेन छोड़ कर गाँधी को पीटने आया था ) खैर गाँधी का प्रत्यारोपण भारत में कर दिया गया ,, अंग्रोजो के रहन सहन के आदि गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में बार बार हुयी उसकी पिटाई की वजह से नायक बना कर भारत लाया गया था भारत में वो विदेशी कपडे पहन कर आया और ट्रेन के अन्दर ही भारतीय भेष भूषा को धारण किया ( सांप ने अपनी केचुली बदल ली ) और उसके बाद अंग्रेजों के मुताबिक काम करता रहा और हालत देश के बटवारे तक जान पहुचे हुतात्मा नाथूराम गोडसे यदि गाँधी से इस देश को मुक्त नहीं करते तो शायद अब तक देश के हालात और अधिक बदत्तर होते और इस्लाम भारत में कायम हो चूका होता || क्योकि गाँधी की अहिंसा कुछ ऐसी थी जब गाँधी के अली भाइयों ने गुप्त रूप से अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर हमला करने का निमंत्रण दिया. तो गाँधी ने क्या कहा यह गाँधी के एक लेख से पता चलता है ,,,, " मै नही समझता कि जैसे ख़बर फैली है,अली भाइयों को क्यो जेल मे डाला जाएगा और मै आजाद रहूँगा?उन्होंने ऐसा कोई कार्य नही किया है कि जो मे न करू। यदि उन्होंने अमीर अफगानिस्तान को आक्रमण के लिए संदेश भेजा है,तो मै भी उसके पास संदेश भेज दूँगा कि जब वो भारत आयेंगे तो जहाँ तक मेरा बस चलेगा एक भी भारतवासी उनको हिंद से बहार निकालने में सरकार कि सहायता नही करेगा।" कश्मीर के विषय में गाँधी हमेशा ये कहते रहे की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौप दी जाय, केवल इसलिए की कश्मीर में मुसाल्मान अधिक है। इसलिए गाँधी जी का मत था की महाराज हरी सिंह को सन्यास लेकर काशी चले जन चाहिए,परन्तु हैदराबाद के विषय में गाँधी की निति भिन्न थी। यद्यपि वहां हिन्दुओं की जनसँख्या अधिक थी ,परन्तु गाँधी जी ने कभी नही कहा की निजाम फकीरी लेकर मक्का चला जाय। कोंग्रेस ने गाँधी जी को सम्मान देने के लिए चरखे वाले झंडे को राष्ट्रिय ध्वज बनाया। प्रत्येक अधिवेशन में प्रचुर मात्रा में ये झंडे लगाये जाते थे. -------------------------------इस झंडे के साथ कोंग्रेस का अति घनिष्ट समबन्ध था। नोआखली के १९४६ के दंगों के बाद वह ध्वज गाँधी जी की कुटिया पर भी लहरा रहा था, परन्तु जब एक मुस्लमान को ध्वज के लहराने से आपत्ति हुई तो गाँधी ने तत्काल उसे उतरवा दिया। इस प्रकार लाखों करोडो देशवासियों की इस ध्वज के प्रति श्रद्धा को अपमानित किया। केवल इसलिए की ध्वज को उतरने से एक मुस्लमान खुश होता था। सुभाषचंद्र बोस अध्यक्ष पद पर रहते हुए गाँधी जी की निति पर नही चले। फ़िर भी वे इतने लोकप्रिय हुए की गाँधी जी की इच्छा के विपरीत पत्ताभी सीतारमैया के विरोध में प्रबल बहुमत से चुने गए ------------------------गाँधी जी को दुःख हुआ.उन्होंने कहा की सुभाष की जीत गाँधी की हार है। -----------------जिस समय तक सुभाष बोस को कोंग्रेस की गद्दी से नही उतरा गया तब तक गाँधी का क्रोध शांत नही हुआ। मुस्लिम लीग देश की शान्ति को भंग कर रही थी। और हिन्दुओं पर अत्याचार कर रही थी। -------------------कोंग्रेस इन अत्याचारों को रोकने के लिए कुछ भी नही करना चाहती थी,क्यो की वह मुसलमानों को प्रसन्न रखना चाहती थी। गाँधी जी जिस बात को अपने अनुकूल नही पते थे ,उसे दबा देते थे। इसलिए मुझे यह सुनकर आश्चर्य होता है की आजादी गाँधी जी ने प्राप्त की । मेरा विचार है की मुसलमानों के आगे झुकना आजादी के लिए लडाई नही थी।------------------गाँधी व उनके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे। गाँधी जी के हिंदू मुस्लिम एकता का सिद्धांत तो उसी समय नष्ट हो गया, जिस समय पाकिस्तान बना। प्रारम्भ से ही मुस्लिम लीग का मत था की भारत एक देश नही है। ------------------------------------हिंदू तो गाँधी के परामर्श पर चलते रहे किंतु मुसलमानों ने गाँधी की तरफ़ ध्यान नही दिया और अपने व्यवहार से वे सदा हिन्दुओं का अपमान और अहित करते रहे और अंत में देश दो टुकडों में बँट गया। ( गाँधी वध क्यों ? के कुछ अंश )

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