Exposing false advertising..

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'तेरा साबुन स्लो है क्या?'

किसी साबुन का यह विज्ञापन आपको याद होगा। एक बच्चा खूब रगड़-रगड़ कर हाथ मल रहा होता है, और दूसरे बच्चे इतनी देर तक हाथ धोने का मजाक बनाते हैं। और दावा करते हैं कि उनका साबुन झट से सारे कीटाणु मार देता है। 

फिर दुनिया भर में कोरोना महामारी आई। संसार भर की सरकारों की एडवाइजरी जारी हुई कि कम से कम बीस सेकेंड तक हाथ धोना चाहिए। उस कम्पनी ने भी अपना वह विज्ञापन न केवल बन्द किया, बल्कि खुद भी कहा कि बीस सेकेंड तक हाथ धोना चाहिए। 

सोचिए, एक को बस पता था देर तक हाथ मलना चाहिए। पीछे का कारण नहीं पता था, फिर भी वह अपनी माँ की बात बिना कारण जाने किये जा रहा था। दूसरे को भी कुछ नहीं पता था, फिर भी उसकी निर्लज्जता देखिए कि वह मजाक उड़ा रहा था। 

कुछ बातें, अनेक बातें हम बस करते चले जाते हैं। परम्परा निभाते जाते हैं। कारण भले पता न हो। हम भूल चुके हैं कि यह परंपरा क्यों थी। पर हमारे चेतन-अवचेतन में यह परम्पराएं पैवस्त हैं। हम जानते हैं कि हमारे पुरखे ज्ञानवान थे, और यदि उन्होंने कुछ रीतियाँ बनाई हैं तो उनके पीछे कोई न कोई कारण होना चाहिए। 

जैसे यह साबुन वाली बात को ही लीजिए। यदि आप अधेड़ावस्था में हैं तो आपको याद होगा कि आपके गांवों में लोग सुबह दिशा-मैदान के पश्चात राख से हाथ मलते थे और इतनी देर तक सीधी हथेली, उल्टी हथेली और उंगलियों को मलते थे कि कोई अगर हाथ धुलाने के लिए लोटा लेकर खड़ा हो तो वह खिन्न हो उठता था। बंगाली साहित्यकार विमल मित्र ने अपने उपन्यास 'साहब बीबी गुलाम' में एक प्रौढ़ स्त्री के बारे में लिखा है जो सीधी और उल्टी हथेली पर सत्तर-सत्तर बार राख मलती थी। ऐसा क्यों? क्या गांवों में रहने वाले इन बूढ़ों को पता था कि देर तक हाथ मलने से कीटाणु मर जाते हैं? उत्तर है नहीं। वे इसलिए ऐसा करते थे क्योंकि उनके माँ-बाप ने यही सिखाया था, जिन्हें उनके माँ-बाप ने ऐसा करना सिखाया था। 

परम्पराओं का निर्वहन होना चाहिए। तब तक होना चाहिए, जब तक उस परम्परा के निर्वहन करने के पीछे की सच्चाई हमें ज्ञात न हो जाएं और आधुनिक परिवेश में वह कालबाह्य या अवैज्ञानिक, हानिकारक सिद्ध न हो जाए। 

मान्यताओं पर तब हँसना उचित है जब विज्ञान उसे मजाक न सिद्ध कर दे। जैसे कोई कहे कि पृथ्वी चपटी है, और वह स्थिर है, और सूर्य इसके चक्कर काटता है, तो हँसी निकलेगी ही। पर कोई कहे कि व्रत रहना चाहिए, और कोई इसपर हँसते हुए कहे कि भूखा रहना बेवकूफी है, तो यह एटीट्यूड मूर्खता ही कही जाएगी। तुम्हें पता ही नहीं कि व्रत के पीछे की क्या रीजनिंग है और तुम इसे नकार रहे हो तो तुम मूर्ख हो। हालांकि अब तो यह सिद्ध हो चुका है, इसपर नोबल पुरस्कार भी जीता गया है कि व्रत रखना स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। 

पर व्रत महिलाएं ही क्यों रहें? 

वे ही कभी अपने बेटों के लिए तो कभी अपने पतियों के लिए व्रत क्यों रहें? 

मर्द क्यों नहीं रखते व्रत? 

उपरोक्त में से कई प्रश्न अधूरे और एकदिशिक हैं। 

व्रत केवल महिलाएं ही नहीं रखती। पुरुष भी रखते हैं। हाँ, वर्तमान में कम ही पुरुष ऐसा कर रहे हैं। पर आप पुराने उपन्यास पढ़िए तो पाएंगे कि सनातनी पुरुष पाक्षिक उपवास अर्थात महीने में दो उपवास रखते थे। मुझ सहित अनेक पुरुष साप्ताहिक उपवास रखते हैं। कोई शिव के नाम पर, कोई हनुमान के नाम पर तो कोई दुर्गा के नाम पर। साल में दो बार नौ-नौ दिन के उपवास भी रखे जाते हैं। तो यह तो सिद्ध हुआ कि व्रत रखना केवल महिलाओं के लिए आरक्षित या कम्पल्सरी नहीं है। 

दूसरा प्रश्न कि महिलाएं ही अपने बेटों और पतियों के लिए व्रत क्यों रखती है, का उत्तर मुझे नहीं पता। वैज्ञानिक उत्तर नहीं पता। पर सामान्य तर्कबुद्धि क्या कहती है, यह बताता हूँ। 

दान देने के लिए धनवान होना जरूरी है। जो धनवान होगा, वो ही गरीब को दान देगा। रक्षा सदैव ही दुर्बल की, कमजोर की की जाती है। रक्षक सदैव ही अधिक शक्तिशाली होता है। जो अधिक सामर्थ्यवान होगा, वही दूसरों की, दुर्बलों की, अपने आश्रितों की रक्षा करेगा। 

स्त्री-पुरुष बराबर नहीं हो सकते। मनुष्य की दो ही जातियां हैं स्त्री और पुरुष, जिसे स्वयं ईश्वर ने (या कहें कि प्रकृति ने) बनाया है। बाकी सभी जातियां या तो भौगोलिक परिस्थितियों ने बनाई कि कोई काला बना रहा तो कोई गोरा हो गया, कोई भूरा हो गया, तो कोई पीला हो गया, या समाज ने बनाया कि कोई ब्राह्मण हो गया तो कोई यहूदी हो गया। यदि स्त्री-पुरुष दोनों को बराबर ही बनाना होता तो ईश्वर (या प्रकृति) दो भिन्न जातियां बनाता ही क्यों? बराबरी भौतिक अधिकारों में है, जैसे बाप के पैसे पर बेटा-बेटी दोनों का हक है। बराबरी आधुनिक मशीनों के बल पर सांसारिक कार्यों में है, जैसे ट्रैक्टर है तो स्त्री हो या पुरुष, दोनों खेत जोत लेंगे। पर जो अंतर है, वह तो है ही। 

स्त्री ही पुरुषों की रक्षा, उनकी लंबी आयु के लिए व्रत क्यों करती है, इसका वैज्ञानिक उत्तर विज्ञान कुछ वर्षों में सम्भव है कि दे दे। वह जब तक उत्तर न दे दे, तब तक प्रतीक्षा कर लीजिए। जिनका मन व्रत रखने का न हो, वो न रखे। पर जो व्रत रखती हैं, वह ये मान कर चलें कि हमारे समाज में स्त्री को शक्तिस्वरूपा कहा जाता है, वे शक्ति धारण करती हैं। उन्हें यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे मात्र एक व्रत से अपनी संतान और अपने पति की रक्षा कर सकती हैं। बचाने वाला सदैव ही बड़ा होता है। 

जिन लोगों ने पिछले कई सालों से टीवी देखा होगा उन्हें पुराने ज़माने के टीवी पर आने वाले प्रचार भी याद होंगे | जब टीवी पर रामायण – महाभारत का युग था उस ज़माने के प्रचार ? “वाशिंग पाउडर निरमा” वाला प्रचार सबको याद होगा | उस प्रचार के पीछे बजने वाली धुन बदली नहीं है इसलिए याद रखना आसान है | एक प्रीति जिंटा वाला “लिरिल” का प्रचार भी कई लोगों को याद होगा | हरे भरे से स्विम सूट में, झरने में इठलाती नवयौवना !

खैर हम जिस प्रचार की याद दिलाने बैठे हैं वो “कोलगेट” टूथ पेस्ट का था | उसमें शुरू में एक पहलवान दिखाते थे जो खूब वर्जिश कर रहा होता है | अखाड़े में मुग्दर घुमाता हुआ | जैसे ही वो कसरत के बाद, दाँतों से एक अखरोट तोड़ने की कोशिश करता है, वैसे ही वो दर्द के मारे जबड़ा पकड़ लेता है | फ़ौरन एक दूसरा आदमी पूछता है दांत कैसे साफ़ करते हो ? जवाब में जब पहलवान कोयला दिखता है तो दूसरा आदमी पूछता है, क्या पहलवान बदन के लिए इतना कुछ और दांतों के लिए कोयला ?

ये कोयले के बदले टूथ पेस्ट नामक अभिजात्य वर्ग के प्रोडक्ट को बेचने का प्रयास था | अब जरा अभी के उसी कोलगेट टूथ पेस्ट के प्रचार को देखिये | चारकोल वाला टूथ पेस्ट का ऐड तो देखा ही होगा, क्यों ?

अब ये बताइये कि जौंडिस के लिए कौन सी दवा ली जाती है ? एलोपैथिक कम्पोजीशन है या आयुर्वेदिक है देखा तो नहीं होगा कभी ! देख लीजिये, लीवर के लिए एलोपैथी में दवाएं नहीं होती, लगभग हरेक आयुर्वेदिक ही होती हैं | इसके अलावा प्लास्टिक सर्जरी के नाम से विख्यात जो तरीका है वो भी 100% भारतीय है | कैसे शुरू हुआ था उसका किस्सा जब भी नेट पर या मेडिकल जर्नल में ढूँढेंगे तो वही लिखा मिलेगा | भारत की दो तीन पीढियां यही देख देख कर बड़ी हुई हैं कि जो भी भारतीय है वो बुरा है | बेकार है | इस सोच के साथ बड़े हुए बुढऊ, सेक्युलर होने के नाम पर भारत की हर चीज़ की बुराई करते अभी भी दिखेंगे |

उन्हें संस्कृत बुरा लगेगा, गणित भी विदेशों से आया लगता है | सर्जरी नाई भी किया करते थे, कह दो, तो कहेंगे बिना पढ़े कैसे करते होंगे ? मगर फिर जब भयानक पूँजी के जोर पर वही उन्हें परोसा जाए तो वो उन्हें एलीट लगने लगेगा | ये दरअसल बरसों की कंडीशनिंग का नतीजा है, जिसने उन्हें बीमार, बहुत बीमार बना दिया है | ये बीमार मष्तिष्क और बिगड़ी हुई मानसिकता का नतीजा है | मस्तिष्क सम्बन्धी रोगों के लिए अक्सर आयुर्वेद में ब्राह्मी और भृंगराज जैसी बूटियाँ दी जाती हैं | ये दोनों अक्सर नालियों के पास अपने आप उग आने वाली बूटियाँ हैं |

अब एक उद्धरण दे रहा हूँ, इनमें कितनी वैज्ञानिकता है इसका निर्णय आप स्वयं कर लीजिएगा - 

द्रव्य शुद्धि 

पुष्कर कहते हैं – परशुरामजी ! अब द्रव्यों की शुद्धि बतलाऊँगा | 

मिट्टी का बर्तन पुन: पकानेसे शुद्ध होता है | किन्तु मल-मूत्र आदिसे स्पर्श हो जानेपर वह पुन: पकानेसे भी शुद्ध नहीं होता | 

सोने का पात्र यदि अपवित्र वस्तुओं से छू जाय तो जलसे धोनेपर पवित्र होता है | ताँबेका बर्तन खटाई और जलसे शुद्ध होता है | 

काँसे और लोहे का बर्तन राखसे मलनेपर पवित्र होता है | 

मोती आदिकी शुद्धि केवल जलसे धोनेपर ही हो जाती है | जलसे उत्पन्न शंख आदि के बने बर्तनों की, सब प्रकार के पत्थर के बने हुए पात्र की तथा साग, रस्सी, फल एवं मूल की और वाँस आदि के दलों से बनी हुई वस्तुओं की शुद्धि भी इसीप्रकार जलसे धोनेमान्त्र से हो जाती है | 

यज्ञकर्म में यज्ञपात्रों की शुद्धि केवल दाहिने हाथसे कुशद्वारा मार्जन करनेपर ही हो जाती है | घी या तेलसे चिकने हुए पात्रों की शुद्धि गरम जलसे होती है | 

घर की शुद्धि झाड़ने-बुहारने और लीपने से होती है | शोधन और प्रोक्षण करने (सींचने) से वस्त्र शुद्ध होता है | रेह की मिट्टी और जलसे उसका शोधन होता है | यदि बहुत से वस्त्रों की ढेरी ही किसी अस्पृश्य वस्तु से छू जाय तो उसपर जल छिडक देनेमात्र से उसकी शुद्धि मानी गयी है | काठ के बने हुए पात्रों की शुद्धि काटकर छिल देने से होती है ||१-५|| 

शय्या आदि संहत वस्तुओं के उच्छिष्ट आदि से दूषित होनेपर प्रोक्षण (सींचने) मात्र से उनकी शुद्धि होती है | घी-तेल आदि की शुद्धि दो कुश पत्रों से उत्पवन करने (उछालने) मात्र से हो जाती है |

 शय्या, आसन, सवारी, सूप, छकड़ा, पुआल और लकड़ी की शुद्धि भी सींचने से ही जाननी चाहिये |

 सींग और दाँत की बनी हुई वस्तुओं की शुद्धि पीली सरसों पीसकर लगानेसे होती है | नारियल और तूँबी आदि फलनिर्मित पात्रों की शुद्धि गोपुच्छ के बालोंद्वारा रगड़नेसे होती है |

 शंख आदि हड्डी के पात्रों की शुद्धि सींग के समान ही पीली सरसों के लेपसे होती है | गोंद, गुड, नमक,कुसुम्भ के फूल, ऊन और कपास की शुद्धि धुप में सुखानेसे होती है | 

नदीका जल सदा शुद्ध रहता है | 

बाजार में बेचने के लिये फैलायी हुई वस्तु भी शुद्ध मानी गयी है ||६-९|| 

गौ के मूँह को छोडकर अन्य सभी अंग शुद्ध हैं | घोड़े और बकरे के मूँह शुद्ध माने गये हैं | स्त्रियों का मुख सदा शुद्ध है | दूध दुहने के समय बछड़ों का, पेड़ से, फल गिराते समय पक्षियों का और शिकार खेलते समय कुत्तों का मूँह भी शुद्ध माना गया है |

 भोजन करने, थूकने, सोने, पानी पीने, नहाने, सड़कपर घुमने और वस्त्र पहनने के बाद अवश्य आचमन करना चाहिये | 

बिलाव घूमने-फिरने से ही शुद्ध होता है | रजस्वला स्त्री चौथे दिन शुद्ध होती है | ऋतूस्नाता स्त्री पाँचवें दिन देवता और पितरों के पुजनकार्य में सम्मिलित होने योग्य होती है | 

शौच के बाद पाँच बार गुदामें, दस बार बायें हाथमें, फिर सात बार दोनों हाथों में, एक बार लिंग में तथा पुन: दो-तीन बार हाथों में मिट्टी लगाकर धोना चाहिये | यह गृहस्थों के लिये शौच का विधान है | 

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासियों के लिये गृहस्थ की अपेक्षा चौगुने शौच का विधान किया गया है ||१०-१४||

 टसर के कपड़ों की शुद्धि बेल के फल के गूदे से होती है | अर्थात उसे पानी में घोलकर उसमें वस्त्रको डुबो दे और फिर साफ़ पानी से धो दे | तीसी एवं सन आदि के सूत से बने हुए कपड़ों की शुद्धि के लिये अर्थात उनमें लगे हुए तेल आदि के दाग को छुड़ाने के लिये पीली सरसों के चूर्ण या उबटन से मिश्रित जल के द्वारा धोना चाहिये |

 मृगचर्म या मृग के रोमों से बने हुए आसन आदि की शुद्धि उसपर जल का छींटा देने मात्र से बतायी गयी है | 

फूलों और फलों की भी उनपर जल छिडकने मात्र से पूर्णत: शुद्धि हो जाती है ||१५-१६||

 इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘द्रव्य-शुद्धि का वर्णन’ नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ||६०||

बाकी अपने गंदे नाले से सर निकाल कर एक विशेष प्रजाति के प्राणी अपने आप ब्राह्मी बूटी कभी नहीं चरते ये भी एक निर्विवाद सत्य है |

बाकी,

मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।

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Peace if possible, truth at all costs.

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